ऑटिज्म – भाग 1 ऑटिज्म क्या है?

शुरुआती लक्षण और पहचान

Dr. Anand Nagdeve

7/31/20261 min read

ऑटिज्म क्या है? हर माता-पिता को यह समझना क्यों ज़रूरी है?

भूमिका

जब मैंने ऑटिज्म पर यह ब्लॉग लिखने का सोचा, तब मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह विषय इतना बड़ा है। शुरुआत में लगा था कि एक ही ब्लॉग में सारी बातें लिख दूँगा, लेकिन जैसे-जैसे मैं इस विषय को विस्तार से लिखता गया, मुझे समझ आया कि अगर माता-पिता को सही और पूरी जानकारी देनी है, तो इसे एक ब्लॉग में समेटना संभव नहीं है।

अपने क्लिनिक में रोज़ ऐसे माता-पिता से मुलाकात होती है, जो अपने बच्चे को लेकर बहुत परेशान रहते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि उनके बच्चे को ऑटिज्म है या ऑटिज्म होने की संभावना है, तो उनके मन में एक साथ बहुत सारे सवाल आते हैं।

"डॉक्टर साहब, मेरा बच्चा ठीक तो हो जाएगा?"

"आख़िर ऑटिज्म हुआ क्यों?"

"क्या गर्भावस्था में हमसे कोई गलती हुई थी?"

"क्या किसी वैक्सीन की वजह से ऐसा हुआ?"

"अब हमें आगे क्या करना चाहिए?"

ऐसे न जाने कितने सवाल लगभग हर माता-पिता पूछते हैं। कई बार इंटरनेट पर भी उन्हें अलग-अलग तरह की जानकारी मिलती है। कुछ बातें सही होती हैं, लेकिन बहुत सारी बातें अधूरी या बिल्कुल गलत होती हैं। ऐसे में माता-पिता और ज़्यादा उलझ जाते हैं।

यही वजह है कि मैंने यह ब्लॉग लिखने का फैसला किया। मेरा उद्देश्य सिर्फ़ ऑटिज्म के बारे में जानकारी देना नहीं है, बल्कि आसान भाषा में, वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर, उन सवालों के जवाब देना है जो लगभग हर माता-पिता के मन में आते हैं।

चूँकि यह विषय बहुत बड़ा है, इसलिए मैंने इसे तीन अलग-अलग भागों में बाँटा है।

पहले भाग में हम समझेंगे कि ऑटिज्म क्या है, इसके शुरुआती लक्षण क्या होते हैं और किन बातों पर माता-पिता को ध्यान देना चाहिए।

दूसरे भाग में बात करेंगे कि ऑटिज्म किन कारणों से हो सकता है, किन बच्चों में इसकी संभावना ज़्यादा रहती है, गर्भावस्था से जुड़े कौन-से जोखिम कारक हैं, और सबसे बड़ा सवाल—क्या वैक्सीन से ऑटिज्म होता है?

तीसरे और आख़िरी भाग में हम जानेंगे कि ऑटिज्म का निदान कैसे किया जाता है, इलाज और अलग-अलग थेरेपी की क्या भूमिका है, और सबसे महत्वपूर्ण—माता-पिता अपने बच्चे की मदद कैसे कर सकते हैं।

अगर आप ऑटिज्म को सही मायने में समझना चाहते हैं, तो मेरी सलाह है कि इस पूरी ब्लॉग सीरीज़ के तीनों भाग ज़रूर पढ़िए। मुझे उम्मीद है कि इसके बाद आपके मन में जो भी सवाल हैं, उनमें से ज़्यादातर के जवाब आपको मिल जाएंगे।

हममें से ज़्यादातर लोग ऑटिज्म को केवल दो बातों से जोड़कर देखते हैं—कि बच्चा देर से बोलता है या अपने आप में रहता है। लेकिन सच यह है कि ऑटिज्म केवल बोलने में देरी या अकेले रहने का नाम नहीं है।

सच इससे कहीं ज़्यादा बड़ा है।

ऑटिज्म केवल बोलने की समस्या नहीं है। यह केवल व्यवहार की समस्या भी नहीं है।

आज पूरी दुनिया में ऑटिज्म के बारे में जागरूकता बढ़ रही है। पहले जिन बच्चों को "जिद्दी", "शरारती", "अपनी ही दुनिया में रहने वाला" या "देर से बोलने वाला" कहकर छोड़ दिया जाता था, आज हम जानते हैं कि उनमें से कई बच्चे वास्तव में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (Autism Spectrum Disorder - ASD) से प्रभावित हो सकते हैं।

ऑटिज्म का इतिहास – यह शब्द आया कहाँ से?

1911 – पहली बार "ऑटिज्म" शब्द का उपयोग

ऑटिज्म शब्द की शुरुआत आज से लगभग 100 साल पहले हुई।

सन् 1911 में स्विट्ज़रलैंड के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. यूजेन ब्लॉयलर (Eugen Bleuler) ने पहली बार "Autism" शब्द का उपयोग किया।

यह शब्द ग्रीक भाषा के "Autos" से बना है, जिसका अर्थ होता है—"स्वयं" या "अपने आप में।"

ध्यान देने वाली बात यह है कि उस समय यह शब्द आज के ऑटिज्म के लिए नहीं, बल्कि स्किज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) से जुड़े कुछ व्यवहारों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

1943 – डॉ. लियो कैनर ने दुनिया को ऑटिज्म से परिचित कराया

अगर आज ऑटिज्म को एक अलग न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति के रूप में पहचाना जाता है, तो इसका सबसे बड़ा श्रेय डॉ. लियो कैनर (Leo Kanner) को जाता है।

सन् 1943 में उन्होंने 11 बच्चों का विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया।

उन्होंने देखा कि इन बच्चों में कुछ बातें एक जैसी थीं—

  • वे लोगों से सामान्य तरीके से जुड़ नहीं पा रहे थे।

  • भाषा के विकास में कठिनाई थी।

  • कुछ व्यवहार बार-बार दोहराए जाते थे।

  • उन्हें अपनी दिनचर्या में बदलाव पसंद नहीं था।

डॉ. कैनर ने इस स्थिति को "Early Infantile Autism" नाम दिया।

यहीं से आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ऑटिज्म को एक अलग पहचान मिली।

1944 – डॉ. हांस एस्परगर की महत्वपूर्ण खोज

लगभग उसी समय ऑस्ट्रिया के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. हांस एस्परगर (Hans Asperger) भी कुछ ऐसे बच्चों का अध्ययन कर रहे थे।

उन्होंने देखा कि कुछ बच्चे बुद्धिमान थे, उनकी भाषा भी अपेक्षाकृत अच्छी थी, लेकिन उन्हें सामाजिक व्यवहार और लोगों से जुड़ने में कठिनाई होती थी।

बाद में इस स्थिति को Asperger Syndrome कहा गया।

हालाँकि आज DSM-5 में Asperger Syndrome को अलग बीमारी नहीं माना जाता, बल्कि इसे Autism Spectrum Disorder (ASD) का ही एक हिस्सा माना जाता है।

1980 के बाद – सोच बदलने लगी

कई वर्षों तक लोगों को लगता था कि ऑटिज्म बहुत दुर्लभ है।

लेकिन जैसे-जैसे रिसर्च बढ़ी, डॉक्टरों को समझ आने लगा कि ऑटिज्म कई रूपों में दिखाई दे सकता है।

किसी बच्चे में लक्षण हल्के होते हैं, किसी में गंभीर।

इसी वजह से बाद में "Autism Spectrum Disorder" शब्द इस्तेमाल होने लगा।

"स्पेक्ट्रम" का मतलब है कि हर बच्चा अलग होता है।

भारत में ऑटिज्म को कब पहचान मिली?

भारत में ऑटिज्म पर व्यवस्थित काम लगभग 1980 और 1990 के दशक में तेज़ी से शुरू हुआ।

बाद में Indian Academy of Pediatrics (IAP) ने भी ऑटिज्म की पहचान और उपचार के लिए दिशा-निर्देश जारी किए, जिससे पूरे देश में एक समान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद मिली।

आज हम ऑटिज्म को कैसे समझते हैं?

आज विज्ञान यह मानता है कि ऑटिज्म कोई मानसिक बीमारी नहीं है, न ही यह किसी की परवरिश या किसी एक गलती का परिणाम है।

यह मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जिसकी पहचान जितनी जल्दी हो जाए, उतनी जल्दी सही सहायता और थेरेपी शुरू की जा सकती है।

यही वजह है कि पिछले 100 वर्षों में ऑटिज्म को लेकर हमारी समझ पूरी तरह बदल चुकी है।

ऑटिज्म क्या है?

ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है।

आसान भाषा में कहूँ तो...

बच्चे का दिमाग जन्म से ही अलग तरीके से विकसित होता है। इसका मतलब यह नहीं कि उसका दिमाग कमजोर है। बल्कि उसका दिमाग जानकारी को समझने, लोगों से जुड़ने, भाषा सीखने और आसपास की चीज़ों पर प्रतिक्रिया देने का तरीका थोड़ा अलग होता है।

इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं Social Communication और Social Interaction में लगातार कठिनाई, तथा सीमित, दोहराए जाने वाले व्यवहार, रुचियाँ या गतिविधियाँ (Restricted and Repetitive Behaviors)

यही कारण है कि ऐसे बच्चे—

  • आँखों में कम देखते हैं।

  • नाम पुकारने पर हमेशा प्रतिक्रिया नहीं देते।

  • बोलना देर से शुरू कर सकते हैं।

  • एक ही खेल बार-बार खेलते हैं।

  • एक जैसी दिनचर्या पसंद करते हैं।

  • कुछ आवाज़ों, रोशनी या स्पर्श से बहुत परेशान हो जाते हैं।

लेकिन याद रखिए...

हर ऑटिज्म वाला बच्चा अलग होता है।

कोई बच्चा बिल्कुल नहीं बोलता, तो कोई बहुत अच्छी अंग्रेज़ी बोलता है लेकिन बातचीत शुरू नहीं कर पाता।

कोई बच्चा पढ़ाई में बहुत अच्छा होता है लेकिन दोस्त नहीं बना पाता।

कोई बच्चा गणित में कमाल का होता है लेकिन अपनी भावनाएँ व्यक्त नहीं कर पाता।

यही वजह है कि इसे स्पेक्ट्रम कहा जाता है।

इसे "स्पेक्ट्रम" क्यों कहते हैं?

मान लीजिए आपके सामने 100 बच्चे हैं जिन्हें ऑटिज्म है।

हो सकता है उनमें से कोई भी दो बच्चे बिल्कुल एक जैसे न हों।

किसी में समस्या बहुत हल्की होगी।

किसी में मध्यम।

किसी में काफी ज़्यादा।

यानी ऑटिज्म कोई "हाँ" या "नहीं" वाली स्थिति नहीं है।

इसकी गंभीरता और लक्षण हर बच्चे में अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए आज पूरी दुनिया में इसे Autism Spectrum Disorder (ASD) कहा जाता है।

क्या ऑटिज्म एक बीमारी है?

यह सवाल माता-पिता अक्सर पूछते हैं।

मेरा जवाब होता है—

ऑटिज्म कोई संक्रमण (इन्फेक्शन) नहीं है।

यह कोई ऐसी बीमारी भी नहीं है जो दवा खाने से एक सप्ताह या एक महीने में ठीक हो जाए।

यह बच्चे के मस्तिष्क के विकास (Brain Development) से जुड़ी स्थिति है।

हाँ, अगर समय पर पहचान हो जाए और सही थेरेपी शुरू हो जाए तो बच्चे के व्यवहार, भाषा, सीखने की क्षमता और सामाजिक कौशल में बहुत अच्छा सुधार लाया जा सकता है। जितनी जल्दी शुरुआत होती है, उतना बेहतर परिणाम मिलने की संभावना रहती है।

ऑटिज्म कितने प्रकार का होता है?

यहाँ एक बात समझना बहुत ज़रूरी है।

पहले मेडिकल साइंस में ऑटिज्म को कई अलग-अलग नामों से बाँटा जाता था।

जैसे—

  • Classic Autism

  • Asperger Syndrome

  • PDD-NOS (Pervasive Developmental Disorder - Not Otherwise Specified)

  • Childhood Disintegrative Disorder

लेकिन 2013 में DSM-5 आने के बाद इन सभी को एक ही नाम के अंतर्गत रखा गया—

Autism Spectrum Disorder (ASD)

यानी आज डॉक्टर सामान्यतः यही निदान लिखते हैं—Autism Spectrum Disorder

फिर हल्का और गंभीर ऑटिज्म कैसे बताया जाता है?

आज डॉक्टर ऑटिज्म को "टाइप" से ज़्यादा सपोर्ट की ज़रूरत के आधार पर समझते हैं।

Level 1 – कम सहायता की आवश्यकता

ऐसे बच्चे बोल लेते हैं।

स्कूल भी जा सकते हैं।

लेकिन दोस्त बनाने, बातचीत समझने या सामाजिक परिस्थितियों में कठिनाई होती है।

Level 2 – मध्यम सहायता की आवश्यकता

भाषा और व्यवहार दोनों में स्पष्ट कठिनाई होती है।

रोज़मर्रा की गतिविधियों में नियमित सहायता की ज़रूरत पड़ती है।

Level 3 – अधिक सहायता की आवश्यकता

बच्चे को लगभग हर गतिविधि में मदद चाहिए होती है।

बोलने में बहुत कठिनाई हो सकती है या बच्चा बिल्कुल नहीं बोलता।

दोहराए जाने वाले व्यवहार (Repetitive Behaviours) अधिक स्पष्ट होते हैं।

ऑटिज्म के सबसे शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?

अधिकांश माता-पिता कहते हैं—

"डॉक्टर साहब, हमें लगा था कि बच्चा थोड़ा देर से बोलेगा।"

यहीं सबसे ज़्यादा समय निकल जाता है।

ऑटिज्म में केवल बोलना देर से होना ही समस्या नहीं है।

असल बात है सोशल कम्युनिकेशन

यानी बच्चा लोगों से जुड़ कैसे रहा है।

कुछ शुरुआती संकेत—

1. नाम पुकारने पर बार-बार प्रतिक्रिया नहीं देना

कई माता-पिता को लगता है कि बच्चा सुन नहीं रहा।

लेकिन उसकी सुनने की क्षमता सामान्य हो सकती है।

2. आँखों में कम देखना

जब आप उससे बात करते हैं तो वह आपकी तरफ कम देखता है।

3. उंगली से इशारा न करना

एक साल के आसपास बच्चा किसी खिलौने या पक्षी को देखकर उंगली से दिखाता है।

ऑटिज्म में यह कौशल देर से विकसित हो सकता है।

4. अपनी खुशी दूसरों के साथ साझा न करना।

सामान्य बच्चा नया खिलौना मिलने पर माँ-पापा को दिखाता है।

ऑटिज्म वाला बच्चा ऐसा कम कर सकता है।

5. बोलने में देरी

12 महीने तक बड़बड़ाना कम होना।

16 महीने तक अर्थपूर्ण शब्द न बोलना।

24 महीने तक दो शब्दों वाले छोटे वाक्य न बनाना—यह मूल्यांकन की ज़रूरत का संकेत हो सकता है।

6. एक ही काम बार-बार करना
  • खिलौनों को लाइन में लगाना

  • पहिए को घुमाते रहना

  • हाथ फड़फड़ाना

  • बार-बार उछलना

  • एक ही वीडियो बार-बार देखना

7. बदलाव पसंद न करना

रोज़ का रास्ता बदल जाए...

कप बदल जाए...

खाने की प्लेट बदल जाए...

तो बच्चा बहुत परेशान हो सकता है।

8. आवाज़ या स्पर्श के प्रति अलग प्रतिक्रिया

कुछ बच्चों को हल्की आवाज़ भी बहुत तेज़ लगती है।

कुछ बच्चों को गले लगना अच्छा नहीं लगता।

कुछ बच्चों को दर्द कम महसूस होता है।

किस उम्र में ऑटिज्म के लक्षण दिखने लगते हैं?

यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है।

ज़्यादातर बच्चों में शुरुआती संकेत 12 से 18 महीने के बीच दिखाई देने लगते हैं।

कुछ बच्चों में 18–24 महीने के बाद लक्षण अधिक स्पष्ट हो जाते हैं।

कई बार माता-पिता कहते हैं—

"पहले तो सब ठीक था, फिर बच्चा बोलना कम करने लगा।"

ऐसी स्थिति में भी तुरंत Pediatrician या डेवलपमेंटल विशेषज्ञ से मिलना चाहिए।

क्या केवल बोलने में देरी का मतलब ऑटिज्म है?

नहीं।

हर देर से बोलने वाला बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित नहीं होता।

और हर ऑटिज्म वाला बच्चा बिल्कुल नहीं बोलता—यह भी सही नहीं है।

इसलिए केवल एक लक्षण देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

डॉक्टर बच्चे की भाषा, सामाजिक व्यवहार, खेल, इशारे, आँखों का संपर्क और विकास के कई पहलुओं का एक साथ मूल्यांकन करते हैं।

माता-पिता के लिए मेरी सलाह

अगर आपका बच्चा—

  • नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया कम देता है,

  • आँखों में कम देखता है,

  • 18 महीने तक बोलना शुरू नहीं हुआ है,

  • इशारे नहीं करता,

  • दूसरों के साथ खेलने में रुचि नहीं दिखाता,

  • या आपको उसके विकास को लेकर कोई भी संदेह है,

तो "अभी छोटा है, अपने आप ठीक हो जाएगा" कहकर इंतज़ार मत कीजिए।

जितनी जल्दी पहचान होगी, उतनी जल्दी सही थेरेपी शुरू होगी और बच्चे के बेहतर विकास की संभावना भी उतनी ही बढ़ेगी।

अगले भाग में...

इस भाग में हमने समझा कि ऑटिज्म क्या है, इसकी पहचान कैसे होती है और इसका इतिहास क्या है।

अगले भाग (भाग–2) में हम विस्तार से बात करेंगे—

  • आखिर ऑटिज्म होता क्यों है?

  • इसके पीछे कौन-कौन से वैज्ञानिक कारण माने जाते हैं?

  • किन बच्चों में ऑटिज्म होने की संभावना अधिक होती है?

  • गर्भावस्था के दौरान कौन-से जोखिम कारक भूमिका निभा सकते हैं?

  • क्या पर्यावरण (Environmental Factors) का इससे कोई संबंध है?

  • क्या वैक्सीन से ऑटिज्म होता है या यह केवल एक मिथक है?

  • क्या मोबाइल, टीवी या ज़्यादा स्क्रीन टाइम ऑटिज्म का कारण बन सकते हैं?

  • क्या माता-पिता की परवरिश या किसी गलती की वजह से ऑटिज्म होता है?

References:

  1. Developmental Pediatrics: CDC Kerala Experience. Second Edition. Author: Prof. (Dr.) M. K. C. Nair, D.Sc. Child Development Centre (CDC), Kerala.

  2. American Psychiatric Association (APA). Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders (DSM-5-TR). 5th Edition, Text Revision, American Psychiatric Publishing, 2022. DSM-5-TR वर्तमान में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के निदान के प्रमुख मानकों में से एक है।

  3. World Health Organization (WHO). International Classification of Diseases, 11th Revision (ICD-11). ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के अंतरराष्ट्रीय निदान मानदंड।

  4. Indian Academy of Pediatrics (IAP). Consensus Statement on Evaluation and Management of Autism Spectrum Disorder. Indian Pediatrics. 2017;54:385–393. (Samir Dalwai, MKC Nair एवं सहयोगी)। भारत में ऑटिज्म के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश।

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