ऑटिज्म – भाग 3 ऑटिज्म का इलाज

डायग्नोसिस, इलाज, थेरेपी और माता-पिता की भूमिका

Dr. Anand Nagdeve

7/31/20261 min read

ऑटिज्म का पता कैसे चलता है?

अगर किसी भी माता-पिता को यह शक हो जाए कि उनका बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित हो सकता है, तो उनके मन में सबसे पहला सवाल यही आता है—

"डॉक्टर साहब, इसकी जाँच कैसे होगी?"

"क्या कोई ब्लड टेस्ट होता है?"

"क्या MRI करवानी पड़ेगी?"

"क्या कोई मशीन बता देती है कि बच्चे को ऑटिज्म है?"

इन सभी सवालों का जवाब अगर मुझे एक ही वाक्य में देना हो, तो मैं यही कहूँगा—

ऑटिज्म का डायग्नोसिस किसी एक ब्लड टेस्ट, एक्स-रे, MRI या CT स्कैन से नहीं होता।

फिर डॉक्टर को कैसे पता चलता है?

ऑटिज्म का डायग्नोसिस मुख्य रूप से बच्चे के व्यवहार (Behaviour), भाषा (Language), सामाजिक विकास (Social Development) और उसके Developmental History को देखकर किया जाता है।

यानी डॉक्टर केवल पाँच मिनट बच्चे को देखकर यह नहीं कहते कि "इसे ऑटिज्म है।"

इसके लिए बच्चे का पूरा विकास समझा जाता है।

जैसे...

  • बच्चे ने गर्दन कब संभाली?

  • बैठना, चलना कब शुरू किया?

  • पहला शब्द कब बोला?

  • क्या वह अपना नाम सुनकर मुड़ता है?

  • क्या वह आँखों में देखकर बात करता है?

  • क्या वह उंगली से किसी चीज़ की ओर इशारा करता है?

  • क्या वह दूसरे बच्चों के साथ खेलना पसंद करता है?

  • क्या वह एक ही काम बार-बार करता है?

इन सभी बातों को एक साथ जोड़कर डॉक्टर निर्णय लेते हैं।

केवल देर से बोलना, ऑटिज्म नहीं होता

कई बार माता-पिता कहते हैं—

"डॉ. आनंद, मेरा बच्चा ढाई साल का है लेकिन अभी बोल नहीं रहा। क्या उसे ऑटिज्म है?"

मेरा जवाब होता है—

ज़रूरी नहीं।

हर देर से बोलने वाला बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित नहीं होता।

कुछ बच्चों में केवल Speech Delay होता है।

कुछ बच्चों में सुनने की समस्या होती है।

कुछ बच्चों में भाषा का विकास थोड़ा धीमा होता है।

और कुछ बच्चों में वास्तव में ऑटिज्म हो सकता है।

इसलिए केवल एक लक्षण देखकर कभी भी निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

डॉक्टर किन बातों पर सबसे ज़्यादा ध्यान देते हैं?

ऑटिज्म का डायग्नोसिस करते समय डॉक्टर मुख्य रूप से दो चीज़ें देखते हैं।

पहली—
बच्चा लोगों से कितना जुड़ता है?

यानी...

  • क्या वह आँखों में देखकर बात करता है?

  • क्या वह मुस्कुराहट का जवाब देता है?

  • क्या वह अपना नाम सुनकर प्रतिक्रिया देता है?

  • क्या वह अपनी खुशी माँ-पापा के साथ बाँटता है?

  • क्या वह दूसरे बच्चों के साथ खेलना चाहता है?

दूसरी—

क्या उसके व्यवहार में बार-बार दोहराई जाने वाली चीज़ें हैं?

जैसे...

  • खिलौनों को लाइन में लगाना।

  • पहियों को बार-बार घुमाना।

  • हाथ फड़फड़ाना।

  • एक ही वीडियो बार-बार देखना।

  • एक ही रास्ते से जाना।

  • दिनचर्या बदलने पर बहुत परेशान हो जाना।

जब ये दोनों तरह की समस्याएँ साथ में दिखाई देती हैं, तब ऑटिज्म की संभावना अधिक होती है।

क्या ऑटिज्म का कोई स्क्रीनिंग टेस्ट भी होता है?

हाँ।

आज पूरी दुनिया में छोटे बच्चों की शुरुआती स्क्रीनिंग के लिए एक प्रश्नावली का उपयोग किया जाता है, जिसे M-CHAT-R/F कहा जाता है।

इसका पूरा नाम है—

Modified Checklist for Autism in Toddlers.

यह लगभग 16 से 30 महीने की उम्र के बच्चों में उपयोग किया जाता है।

लेकिन यहाँ एक बात याद रखिए...

M-CHAT डायग्नोसिस नहीं करता।

यह केवल यह बताता है कि बच्चे को आगे विशेषज्ञ द्वारा विस्तार से दिखाने की ज़रूरत है या नहीं।

यानी अगर M-CHAT पॉज़िटिव आता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि बच्चे को निश्चित रूप से ऑटिज्म है।

और अगर नेगेटिव आता है, तब भी यदि माता-पिता या डॉक्टर को संदेह है, तो बच्चे का मूल्यांकन ज़रूर किया जाना चाहिए।

क्या हर बच्चे का MRI करवाना चाहिए?

नहीं।

यह बहुत बड़ा भ्रम है।

सिर्फ़ ऑटिज्म होने की वजह से हर बच्चे का MRI करवाना ज़रूरी नहीं होता।

MRI तब कराया जाता है जब डॉक्टर को कोई दूसरी न्यूरोलॉजिकल समस्या का संदेह हो।

जैसे...

  • बार-बार दौरे पड़ना।

  • सिर का आकार असामान्य होना।

  • शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी होना।

  • विकास में बहुत गंभीर असामान्यता होना।

यदि केवल ऑटिज्म है, तो ज़्यादातर बच्चों में MRI सामान्य ही आता है।

क्या EEG करवाना चाहिए?

अगर बच्चे को दौरे (Seizures) नहीं आते हैं, तो केवल ऑटिज्म की वजह से EEG करवाने की ज़रूरत नहीं होती।

हाँ, अगर डॉक्टर को मिर्गी या दौरे का संदेह है, तब EEG कराया जा सकता है।

क्या ब्लड टेस्ट से ऑटिज्म पता चल जाता है?

नहीं।

आज तक ऐसा कोई ब्लड टेस्ट नहीं है जो यह बता दे कि बच्चे को ऑटिज्म है।

कुछ विशेष परिस्थितियों में डॉक्टर—

  • Genetic Test

  • Chromosomal Microarray

  • Fragile X Test

जैसी जाँचें सलाह दे सकते हैं।

लेकिन ये भी हर बच्चे में नहीं कराई जातीं।

इनकी आवश्यकता बच्चे की स्थिति देखकर तय की जाती है।

जल्दी डायग्नोसिस इतना ज़रूरी क्यों है?

यह शायद पूरे इलाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बहुत से माता-पिता सोचते हैं—

"अभी छोटा है... थोड़ा और इंतज़ार करते हैं..."

यहीं सबसे ज़्यादा समय निकल जाता है।

बच्चे के जीवन के पहले पाँच साल मस्तिष्क के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।

इसी समय बच्चा सबसे तेज़ी से सीखता है।

अगर इसी समय सही थेरेपी शुरू हो जाए, तो उसके भाषा, व्यवहार और सीखने की क्षमता में बहुत अच्छा सुधार देखने को मिल सकता है।

इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ—

"अगर शक है, तो इंतज़ार मत कीजिए... जाँच कराइए।"

अगर बाद में पता चला कि बच्चा सामान्य है, तो बहुत अच्छी बात है।

लेकिन अगर वास्तव में ऑटिज्म है और हमने दो-तीन साल इंतज़ार कर दिया, तो यह समय दोबारा वापस नहीं आता।

ऑटिज्म का इलाज कैसे किया जाता है?

ऑटिज्म कोई ऐसा संक्रमण नहीं है, जिसे एंटीबायोटिक देकर ठीक कर दिया जाए।

यह कोई ऐसी बीमारी भी नहीं है, जिसके लिए एक गोली या एक इंजेक्शन मौजूद हो।

ऑटिज्म मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक स्थिति है।

इसलिए इसका इलाज भी केवल दवाइयों से नहीं होता, बल्कि बच्चे को उसकी ज़रूरत के अनुसार सही थेरेपी और प्रशिक्षण (Intervention) देकर किया जाता है।

इलाज जितना जल्दी शुरू होगा, उतना बेहतर

मैं अपने क्लिनिक में एक बात हमेशा कहता हूँ—

"ऑटिज्म में सबसे अच्छी दवा है—समय पर पहचान।"

क्योंकि बच्चे के जीवन के शुरुआती पाँच साल उसके मस्तिष्क के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।

इसी समय बच्चा सबसे तेज़ी से सीखता है।

अगर इसी समय सही थेरेपी शुरू हो जाए, तो भाषा, व्यवहार, सीखने की क्षमता और सामाजिक विकास में बहुत अच्छा सुधार देखने को मिल सकता है।

इसीलिए पूरी दुनिया में Early Intervention पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है।

स्पीच थेरेपी (Speech Therapy)

जब लोग स्पीच थेरेपी का नाम सुनते हैं, तो उन्हें लगता है कि इसमें केवल बच्चे को बोलना सिखाया जाता है।

लेकिन स्पीच थेरेपी इससे कहीं ज़्यादा है।

इसका उद्देश्य बच्चे को दूसरों से संवाद करना सिखाना होता है।

जैसे—

  • अपनी ज़रूरत बताना।

  • किसी चीज़ की माँग करना।

  • सामने वाले की बात समझना।

  • बातचीत शुरू करना।

  • अपनी भावनाएँ व्यक्त करना।

  • आँखों का संपर्क बढ़ाना।

अगर बच्चा बोल नहीं सकता, तो स्पीच थेरेपिस्ट उसे इशारों, चित्रों (PECS) या अन्य वैकल्पिक तरीकों से संवाद करना भी सिखा सकते हैं।

ऑक्यूपेशनल थेरेपी (Occupational Therapy)

इस थेरेपी का उद्देश्य बच्चे को रोज़मर्रा के काम अधिक स्वतंत्रता से करना सिखाना है।

अगर किसी बच्चे को—

  • कपड़े पहनने में परेशानी है,

  • चम्मच से खाना खाने में कठिनाई है,

  • पेंसिल पकड़ने में दिक्कत है,

  • संतुलन बनाने में समस्या है,

  • या आवाज़, स्पर्श और रोशनी जैसी चीज़ों से बहुत परेशानी होती है,

तो ऑक्यूपेशनल थेरेपी उसकी मदद करती है।

बिहेवियर थेरेपी (Behaviour Therapy)

ऑटिज्म वाले बच्चों में कई बार कुछ व्यवहार ऐसे होते हैं जो उनके सीखने या रोज़मर्रा के जीवन में बाधा बनते हैं।

जैसे—

  • बार-बार गुस्सा करना।

  • अपनी बात न बता पाने पर रोना।

  • खुद को चोट पहुँचाना।

  • दूसरों को मारना।

  • एक ही काम बार-बार करना।

बिहेवियर थेरेपी का उद्देश्य बच्चे को सज़ा देना नहीं है।

बल्कि यह समझना होता है कि वह ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है और उसे बेहतर तरीके से अपनी ज़रूरत बताना कैसे सिखाया जाए।

ABA थेरेपी

ABA यानी Applied Behavior Analysis

यह ऑटिज्म में सबसे ज़्यादा अध्ययन की गई थेरेपी में से एक है।

इसमें बच्चे को छोटे-छोटे चरणों में नई चीज़ें सिखाई जाती हैं और अच्छे व्यवहार को सकारात्मक प्रोत्साहन (Positive Reinforcement) दिया जाता है।

हालाँकि आज केवल ABA ही एकमात्र विकल्प नहीं है। कई आधुनिक विकासात्मक (Developmental) और प्राकृतिक (Naturalistic) थेरेपी मॉडल भी अच्छे परिणाम देते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर बच्चे के लिए थेरेपी उसकी ज़रूरत के अनुसार चुनी जानी चाहिए।

क्या दवाइयों से ऑटिज्म ठीक हो जाता है?

इसका जवाब है—

नहीं।

आज तक ऐसी कोई दवा नहीं बनी है जो ऑटिज्म को पूरी तरह समाप्त कर दे।

लेकिन कुछ बच्चों में साथ में दूसरी समस्याएँ भी होती हैं।

जैसे—

  • बहुत ज़्यादा Hyperactivity

  • गंभीर चिड़चिड़ापन

  • बार-बार गुस्सा आना

  • Anxiety

  • नींद की समस्या

  • दौरे (Seizures)

इन स्थितियों में डॉक्टर दवाइयाँ दे सकते हैं।

यानी दवाइयाँ ऑटिज्म को नहीं, बल्कि उससे जुड़ी कुछ समस्याओं को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।

इंटरनेट पर मिलने वाले "चमत्कारी इलाज" से सावधान रहें

आजकल सोशल मीडिया पर कई विज्ञापन दिखाई देते हैं—

"15 दिन में ऑटिज्म ठीक।"

"100% गारंटी।"

"स्टेम सेल से पूरा इलाज।"

"एक इंजेक्शन में ऑटिज्म खत्म।"

अगर कोई ऐसा दावा करता है, तो बहुत सावधान हो जाइए।

आज तक किसी भी बड़े वैज्ञानिक अध्ययन ने यह साबित नहीं किया है कि—

  • स्टेम सेल थेरेपी,

  • हाइपरबैरिक ऑक्सीजन थेरेपी (HBOT),

  • भारी धातु निकालने की थेरेपी (Chelation),

  • या कोई चमत्कारी सप्लीमेंट

ऑटिज्म का प्रमाणित इलाज हैं।

कुछ उपचार तो नुकसान भी पहुँचा सकते हैं।

क्या ऑटिज्म वाला बच्चा सामान्य जीवन जी सकता है?

यह सवाल बहुत भावनात्मक होता है।

और इसका जवाब हर बच्चे के लिए अलग होता है।

कुछ बच्चे—

  • सामान्य स्कूल जाते हैं।

  • अच्छी पढ़ाई करते हैं।

  • नौकरी करते हैं।

  • स्वतंत्र जीवन जीते हैं।

कुछ बच्चों को जीवनभर थोड़ी सहायता की आवश्यकता रहती है।

और कुछ बच्चों को अधिक सहायता की ज़रूरत हो सकती है।

यानी भविष्य इस बात पर निर्भर करता है—

  • ऑटिज्म कितना गंभीर है।

  • भाषा का विकास कैसा है।

  • अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ हैं या नहीं।

  • और सबसे महत्वपूर्ण...

सही समय पर सही थेरेपी शुरू हुई या नहीं।

माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है

थेरेपिस्ट सप्ताह में दो या तीन घंटे बच्चे के साथ काम करेगा।

लेकिन बच्चा बाकी पूरा समय किसके साथ रहता है?

अपने परिवार के साथ।

इसलिए घर ही बच्चे की सबसे बड़ी सीखने की जगह है।

माता-पिता क्या करें?

✔ बच्चे से ज़्यादा से ज़्यादा बात करें।

✔ उसके साथ रोज़ खेलें।

✔ किताबें पढ़ें।

✔ स्क्रीन टाइम कम रखें।

✔ छोटी-छोटी प्रगति पर भी उसकी तारीफ़ करें।

✔ उसकी तुलना दूसरे बच्चों से कभी न करें।

✔ डॉक्टर और थेरेपिस्ट की सलाह का नियमित पालन करें।

और सबसे ज़रूरी...

धैर्य रखिए।

ऑटिज्म का इलाज 15–20 दिन का नहीं होता।

यह एक यात्रा है, जिसमें धीरे-धीरे बच्चे में बदलाव आता है।

मैं अपने क्लिनिक में माता-पिता से हमेशा एक बात कहता हूँ—

"ऑटिज्म आपके बच्चे की पहचान नहीं है, यह उसकी केवल एक मेडिकल स्थिति है।"

आपका बच्चा सबसे पहले एक बच्चा है।

उसे भी प्यार चाहिए...

उसे भी खेलने का अधिकार है...

उसे भी सीखने का मौका चाहिए...

और सबसे ज़्यादा ज़रूरत है—

आपके धैर्य, आपके भरोसे और आपके साथ की।

मैंने ऐसे बहुत से बच्चों को देखा है, जो शुरू में अपना नाम तक नहीं सुनते थे, लेकिन सही समय पर थेरेपी, परिवार के सहयोग और लगातार प्रयासों की वजह से आज स्कूल जा रहे हैं, बातचीत कर रहे हैं और पहले से कहीं बेहतर जीवन जी रहे हैं।

हर बच्चे की यात्रा अलग होती है।

इसलिए अपने बच्चे की तुलना किसी दूसरे बच्चे से मत कीजिए।

उसकी तुलना केवल उसके कल से कीजिए।

अगर आज वह कल से एक कदम आगे बढ़ा है, तो समझिए आप सही दिशा में हैं।

निष्कर्ष

अगर इस पूरी ब्लॉग सीरीज़ से आपको केवल तीन बातें याद रखनी हों, तो वे ये हैं—

  1. ऑटिज्म की जल्दी पहचान सबसे ज़रूरी है।

  2. सही समय पर शुरू की गई थेरेपी बच्चे के भविष्य में बड़ा बदलाव ला सकती है।

  3. ऑटिज्म किसी की गलती नहीं है, लेकिन सही समय पर सही कदम उठाना हमारी ज़िम्मेदारी है।

References:

  1. Developmental Pediatrics: CDC Kerala Experience. Second Edition. Author: Prof. (Dr.) M. K. C. Nair, D.Sc. Child Development Centre (CDC), Kerala.

  2. American Psychiatric Association (APA). Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders (DSM-5-TR). 5th Edition, Text Revision, American Psychiatric Publishing, 2022. DSM-5-TR वर्तमान में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के निदान के प्रमुख मानकों में से एक है।

  3. World Health Organization (WHO). International Classification of Diseases, 11th Revision (ICD-11). ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के अंतरराष्ट्रीय निदान मानदंड।

  4. Indian Academy of Pediatrics (IAP). Consensus Statement on Evaluation and Management of Autism Spectrum Disorder. Indian Pediatrics. 2017;54:385–393. (Samir Dalwai, MKC Nair एवं सहयोगी)। भारत में ऑटिज्म के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश।

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