बच्चों में बुखार (Fever in Children)

माता-पिता के लिए संपूर्ण वैज्ञानिक मार्गदर्शिका

Dr. Anand Nagdeve

8/15/20261 min read

बच्चों में बुखार: क्या करें, कब चिंता करें और कब डॉक्टर को दिखाएँ?

बुखार बच्चों में सबसे आम समस्या क्यों है?

मैं एक शिशु रोग विशेषज्ञ हूँ और अपने क्लिनिक में रोज़ाना कई बच्चों को देखता हूँ। अगर मुझसे पूछा जाए कि माता-पिता अपने बच्चे को लेकर सबसे ज्यादा किस समस्या के कारण डॉक्टर के पास आते हैं, तो उनमें बुखार सबसे ऊपर होगा।

छोटे बच्चे हों या बड़े बच्चे, साल में कई बार उन्हें बुखार हो सकता है। खासकर मौसम बदलने पर, स्कूल जाने वाले बच्चों में या घर में किसी दूसरे व्यक्ति को वायरल संक्रमण होने पर बुखार आना बहुत सामान्य है।

इसीलिए मैंने सोचा कि बुखार के बारे में एक ऐसी सरल जानकारी होनी चाहिए, जिसमें माता-पिता को यह समझ में आए कि—

बुखार क्या है?
कितना बुखार चिंता की बात है?
बुखार में घर पर क्या करना चाहिए?
दवाई कब देनी चाहिए?
और कब बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए?

तो चलिए, बिल्कुल आसान भाषा में बुखार को समझते हैं।

बुखार क्या है?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बुखार अपने आप में कोई बीमारी नहीं है।

बुखार शरीर का एक संकेत है कि शरीर के अंदर कुछ हो रहा है। ज्यादातर बच्चों में इसका कारण कोई संक्रमण होता है, जैसे वायरल संक्रमण या कभी-कभी बैक्टीरियल संक्रमण।

हमारे दिमाग में एक हिस्सा होता है जिसे हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) कहते हैं। यह शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है।

जब शरीर को लगता है कि कोई संक्रमण है, तो यह तापमान को कुछ समय के लिए बढ़ा देता है। यही हमें बुखार के रूप में दिखाई देता है।

इसलिए बुखार को केवल दुश्मन समझना सही नहीं है। यह शरीर की संक्रमण से लड़ने वाली प्रतिक्रिया का एक हिस्सा है।

बुखार की परिभाषा क्या है?

आम तौर पर जब शरीर का तापमान 38°C (100.4°F) या उससे अधिक हो, तो इसे बुखार कहा जाता है।

लेकिन तापमान कहाँ से मापा गया है, इससे भी रीडिंग में थोड़ा अंतर हो सकता है।

इसलिए केवल यह कहना कि "बच्चा गर्म लग रहा है" बुखार की सही पहचान नहीं है।

बुखार को थर्मामीटर से मापना चाहिए।

बुखार नापने की शुरुआत कैसे हुई?

आज हमारे पास डिजिटल थर्मामीटर हैं और कुछ सेकंड में तापमान पता चल जाता है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था।

पुराने समय में डॉक्टर केवल हाथ लगाकर या मरीज की त्वचा महसूस करके अंदाजा लगाते थे कि शरीर गर्म है या नहीं।

बाद में वैज्ञानिकों ने तापमान को संख्या में मापने के लिए थर्मामीटर विकसित किए। सैंटोरियो सैंटोरियो (Santorio Santorio) ने 17वीं शताब्दी की शुरुआत में मानव शरीर का तापमान मापने के लिए शुरुआती थर्मोस्कोप/थर्मामीटर जैसे उपकरणों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

बाद में डैनियल गैब्रियल फारेनहाइट (Daniel Gabriel Fahrenheit) और एंडर्स सेल्सियस (Anders Celsius) जैसे वैज्ञानिकों ने तापमान मापने के पैमाने को विकसित और व्यवस्थित किया।

आज हम मुख्य रूप से °C (सेल्सियस) और °F (फारेनहाइट) में तापमान मापते हैं।

यानी आज जो हम आसानी से कहते हैं कि "बच्चे को 102°F बुखार है", उसके पीछे तापमान मापने के सैकड़ों वर्षों का वैज्ञानिक विकास है

एक छोटी-सी बात…

दोस्तों, इस विषय से थोड़ा हटकर एक बात कहना चाहता हूँ। मोबाइल, लैपटॉप, बिजली, बल्ब और इंटरनेट जैसी हमारी रोज़मर्रा की सुविधाओं के पीछे हजारों वैज्ञानिकों की वर्षों की मेहनत है।

बच्चों को केवल क्रिकेटर या सेलिब्रिटी का फैन बनना ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों की खोजों और उनके संघर्षों के बारे में भी जानना चाहिए। उनमें यह जिज्ञासा पैदा करें कि “मैं भी कुछ नया खोज सकता हूँ, बना सकता हूँ।”

सिर्फ Consumer मत बनिए, Inventor बनने की सोचिए।
Science केवल एक विषय नहीं, बल्कि सवाल पूछने और नई चीज़ें खोजने की सोच है।

मैं स्वयं बच्चों में Science के प्रति रुचि और Scientific Thinking पर एक ब्लॉग लिखने के लिए काम कर रहा हूँ। बहुत जल्द इस वेबसाइट पर इस विषय से जुड़ा एक नया ब्लॉग प्रकाशित होगा।

अब वापस अपने विषय पर आते हैं…

बच्चे का तापमान कैसे नापें?

बच्चे को बुखार है या नहीं, यह पता करने के लिए डिजिटल थर्मामीटर सबसे आसान और सुरक्षित तरीका है।

बच्चे की उम्र के अनुसार तापमान मापने का तरीका अलग हो सकता है।

छोटे बच्चों में बगल से तापमान लेना आसान होता है। कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर कान या मलाशय (Rectal) से तापमान लेने की सलाह दे सकते हैं।

सबसे जरूरी बात यह है कि—

हर बार तापमान लगभग उसी तरीके से मापें और रीडिंग को उसी तरीके से समझें।

सिर्फ बच्चे के माथे पर हाथ लगाकर यह तय नहीं किया जा सकता कि उसे कितना बुखार है।

कितना तापमान बुखार कहलाता है?

सामान्य रूप से—

38°C (100.4°F) या उससे अधिक तापमान को बुखार माना जाता है।

लेकिन यहाँ एक बात बहुत जरूरी है।

बुखार को केवल "माइल्ड, मॉडरेट और सीवियर" में बाँटकर बीमारी की गंभीरता तय करना सही तरीका नहीं है।

उदाहरण के लिए किसी बच्चे को 103°F बुखार हो सकता है लेकिन वह आराम से पानी पी रहा हो, खेल रहा हो और सामान्य व्यवहार कर रहा हो।

वहीं दूसरे बच्चे को 101°F बुखार हो सकता है लेकिन वह बहुत सुस्त हो, पानी न पी रहा हो और साँस लेने में परेशानी हो।

इन दोनों में दूसरे बच्चे की स्थिति ज्यादा चिंता वाली हो सकती है।

इसलिए—

तापमान की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि बच्चा कैसा दिख रहा है।

क्या ज्यादा बुखार मतलब ज्यादा गंभीर बीमारी?

जरूरी नहीं।

यह माता-पिता की सबसे आम गलतफहमियों में से एक है।

कई वायरल संक्रमणों में बच्चों को 102–104°F तक बुखार हो सकता है और फिर भी बच्चा कुछ समय बाद ठीक हो जाता है।

दूसरी तरफ गंभीर संक्रमण कभी-कभी बहुत ज्यादा बुखार के बिना भी हो सकते हैं।

इसलिए डॉक्टर केवल थर्मामीटर नहीं देखते। हम बच्चे को देखते हैं—

  • बच्चा कितना एक्टिव है?

  • पानी या दूध पी रहा है या नहीं?

  • साँस कैसी चल रही है?

  • बच्चा सामान्य तरीके से प्रतिक्रिया कर रहा है या नहीं?

  • पेशाब ठीक हो रहा है या नहीं?

  • कोई और लक्षण तो नहीं हैं?

इन सब बातों को मिलाकर बीमारी की गंभीरता समझी जाती है।

क्या हर 3–4 घंटे में बार-बार बुखार आना गंभीर बीमारी की निशानी है?

जरूरी नहीं।

बुखार की दवाई का असर खत्म होने के बाद तापमान दोबारा बढ़ सकता है। खासकर वायरल इंफेक्शन में ऐसा कई दिनों तक हो सकता है। इसलिए केवल यह देखना कि बुखार कितने घंटे बाद वापस आया, इससे बीमारी की गंभीरता तय नहीं की जा सकती।

हमें यह देखना ज्यादा जरूरी है कि बुखार के बीच में बच्चा कैसा है—क्या वह खेल रहा है, पानी या दूध पी रहा है, सामान्य तरीके से बात या प्रतिक्रिया कर रहा है और ठीक से पेशाब कर रहा है?

लेकिन अगर बुखार के साथ बच्चा बहुत सुस्त हो, साँस लेने में परेशानी हो, पानी न पी पा रहा हो, बार-बार उल्टी हो, झटके आएँ या कोई अन्य Danger Sign दिखाई दे, तो डॉक्टर को दिखाना जरूरी है।

बुखार कितनी बार आया, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि बुखार के बीच बच्चा कैसा है।

बच्चों को बुखार किन कारणों से आता है?

बच्चों में बुखार का सबसे सामान्य कारण इन्फेक्शन है।

इनमें सबसे ज्यादा सामान्य हैं वायरल संक्रमण।

जैसे—

  • सर्दी-जुकाम

  • वायरल गले का संक्रमण

  • फ्लू

  • वायरल दस्त

  • कुछ वायरल रैश वाली बीमारियाँ

इसके अलावा कुछ बैक्टीरियल संक्रमणों में भी बुखार हो सकता है, जैसे—

  • निमोनिया

  • यूरिन इंफेक्शन

  • कुछ कान के संक्रमण

  • टाइफाइड

  • गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण

लेकिन हर बुखार में कारण एक जैसा नहीं होता। इसलिए बुखार के साथ दूसरे लक्षणों को देखना बहुत जरूरी है।

क्या हर बीमारी में बुखार आता है?

नहीं।

हर बीमारी में बुखार आना जरूरी नहीं है।

कई संक्रमणों में बुखार हो सकता है, लेकिन कुछ संक्रमण बिना बुखार के भी हो सकते हैं।

इसी तरह हर बार बुखार आने का मतलब भी संक्रमण ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है।

इसलिए केवल "बुखार है या नहीं" से पूरी बीमारी का पता नहीं लगाया जा सकता।

क्या दाँत निकलने से बुखार आता है?

यह सवाल माता-पिता बहुत पूछते हैं।

जब बच्चे के दाँत निकलते हैं, तो वह चिड़चिड़ा हो सकता है, लार ज्यादा आ सकती है और उसे मसूड़ों में असुविधा हो सकती है।

लेकिन तेज बुखार को केवल दाँत निकलने के कारण मान लेना सही नहीं है।

अगर बच्चे को स्पष्ट बुखार है, खासकर 38°C या उससे अधिक, तो किसी संक्रमण की संभावना पर भी ध्यान देना चाहिए।

इसलिए हर बुखार को "दाँत निकल रहे हैं" कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

क्या हर बुखार में दवाई देने की जरूरत होती है?

नहीं।

यह बात बहुत महत्वपूर्ण है।

अगर बच्चे को बुखार है लेकिन वह—

  • खेल रहा है,

  • पानी पी रहा है,

  • दूध पी रहा है,

  • सामान्य व्यवहार कर रहा है,

तो केवल थर्मामीटर की संख्या देखकर दवाई देना जरूरी नहीं है।

बुखार की दवाई का मुख्य उद्देश्य बच्चे को आराम पहुँचाना है।

अगर बच्चा बुखार के कारण बहुत परेशान है, दर्द में है या आराम नहीं कर पा रहा है, तब बुखार कम करने वाली दवाई दी जा सकती है।

बुखार में कौन-सी दवाई दी जाती है?

बच्चों में बुखार और दर्द के लिए सबसे सामान्य दवाई पैरासिटामॉल (Paracetamol) है।

इसकी मात्रा बच्चे के वजन के अनुसार तय की जाती है।

इसलिए यह कहना कि "दो साल के बच्चे को इतनी चम्मच" हर बच्चे के लिए सही नहीं होगा।

क्योंकि एक ही उम्र के दो बच्चों का वजन अलग हो सकता है और अलग-अलग सिरप की ताकत भी अलग हो सकती है।

इसलिए दवा देते समय—

बच्चे का वजन + दवा की strength + सही dose—इन तीनों को ध्यान में रखना चाहिए।

पैरासिटामॉल देने के बाद तापमान बिल्कुल 98.6°F होना जरूरी है?

नहीं।

यह भी एक बहुत सामान्य गलतफहमी है।

पैरासिटामॉल देने के बाद अगर तापमान 103°F से घटकर 101°F हो गया और बच्चा आराम करने लगा, पानी पीने लगा और एक्टिव हो गया, तो यह अच्छी बात है।

दवाई का उद्देश्य हर बार तापमान को बिल्कुल 98.6°F करना नहीं है।

हमारा लक्ष्य बच्चे को आराम देना है, केवल थर्मामीटर की संख्या को सामान्य करना नहीं।

पैरासिटामॉल कितने घंटे बाद दोबारा दे सकते हैं?

यदि बच्चे को दोबारा दवा की जरूरत है, तो पैरासिटामॉल की अगली खुराक सामान्यतः कम-से-कम 4–6 घंटे के अंतराल के बाद दी जाती है।

लेकिन केवल इसलिए कि बुखार फिर से आ गया है, तुरंत अगली खुराक नहीं देनी चाहिए।

साथ ही 24 घंटे में कुल कितनी मात्रा दी गई है, इसका ध्यान रखना जरूरी है।

सबसे सुरक्षित तरीका है कि बच्चे के वजन के अनुसार डॉक्टर द्वारा बताई गई dose और frequency का पालन किया जाए।

पैरासिटामॉल देने के बाद भी बुखार नहीं उतरा तो?

सबसे पहले घबराने की जरूरत नहीं है।

पैरासिटामॉल देने के तुरंत बाद बुखार सामान्य नहीं हो जाता। इसे असर करने में कुछ समय लगता है।

और अगर तापमान कुछ कम हुआ लेकिन पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ, तो इसका मतलब यह नहीं कि दवाई काम नहीं कर रही।

सबसे पहले बच्चे को देखिए।

अगर बच्चा बेहतर महसूस कर रहा है, पानी पी रहा है और सामान्य व्यवहार कर रहा है, तो यह अच्छा संकेत है।

सिर्फ इसलिए कि बुखार 101°F या 102°F है, तुरंत दूसरी दवाई शुरू करना जरूरी नहीं है।

क्या पैरासिटामॉल से बुखार नहीं उतरा तो दूसरी दवाई दे सकते हैं?

आइबुप्रोफेन (Ibuprofen) जैसी दूसरी दवाएँ कुछ बच्चों में उपयोग की जा सकती हैं, लेकिन हर बच्चे के लिए यह सही नहीं होती।

विशेषकर छोटे बच्चों, निर्जलीकरण, किडनी की समस्या या कुछ अन्य परिस्थितियों में आइबुप्रोफेन उचित नहीं हो सकती।

इसलिए माता-पिता को अपने आप पैरासिटामॉल और आइबुप्रोफेन को बार-बार बदल-बदलकर देने की आदत नहीं डालनी चाहिए।

अगर बच्चा लगातार परेशान है या बुखार की स्थिति आपको असामान्य लग रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

बुखार में ठंड क्यों लगती है?

यह बहुत दिलचस्प बात है।

जब शरीर बुखार बढ़ाने का फैसला करता है, तो दिमाग शरीर का "सेट तापमान" ऊपर कर देता है।

मान लीजिए बच्चे का शरीर पहले 37°C के आसपास था और अब शरीर ने तापमान का लक्ष्य बढ़ा दिया।

उस समय बच्चे का वास्तविक तापमान भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन शरीर को लगता है कि अभी भी वह अपने नए लक्ष्य से कम है।

इसलिए बच्चा—

  • काँप सकता है,

  • ठंड की शिकायत कर सकता है,

  • कंबल माँग सकता है।

इसीलिए बुखार चढ़ते समय कई बच्चों को ठंड लगती है या कंपकंपी होती है।

फिर बुखार उतरते समय गर्मी और पसीना क्यों आता है?

जब शरीर तय करता है कि अब तापमान कम करना है, तो शरीर का "सेट पॉइंट" वापस सामान्य होने लगता है।

अब शरीर को गर्मी बाहर निकालनी होती है।

इसलिए—

  • त्वचा गर्म लगती है,

  • बच्चा गर्मी महसूस करता है,

  • रक्त की नलियाँ फैलती हैं,

  • और पसीना आ सकता है।

पसीना शरीर को ठंडा करने का प्राकृतिक तरीका है।

इसलिए कई बार माता-पिता कहते हैं—

"डॉक्टर साहब, पसीना आ गया, अब बुखार उतर रहा है।"

कई मामलों में यह वास्तव में शरीर के तापमान को नीचे लाने की प्रक्रिया का हिस्सा होता है।

बुखार में स्पंजिंग करनी चाहिए?

हर बुखार में स्पंजिंग करने की जरूरत नहीं होती।

बच्चे को बहुत ज्यादा कपड़ों या कंबल में लपेटने से बचें और उसे आरामदायक कपड़े पहनाएँ।

यदि बच्चा बहुत असहज है तो सामान्य या हल्के गुनगुने पानी से आराम दिलाया जा सकता है।

बर्फ या बहुत ठंडे पानी से शरीर को ठंडा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे बच्चे को कंपकंपी हो सकती है और वह और ज्यादा परेशान हो सकता है।

बुखार के साथ बच्चे को कब डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल।

अगर बच्चा छोटा है और बुखार है, तो उम्र और बच्चे की स्थिति दोनों महत्वपूर्ण हैं।

विशेष रूप से 3 महीने से कम उम्र के बच्चे का तापमान 38°C (100.4°F) या उससे अधिक हो, तो उसे तुरंत चिकित्सकीय मूल्यांकन की जरूरत होती है।

बड़े बच्चे में भी निम्न लक्षण हों तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए—

  • बच्चा बहुत सुस्त हो।

  • बच्चा ठीक से जाग या प्रतिक्रिया न दे रहा हो।

  • साँस लेने में परेशानी हो।

  • बच्चा पानी या दूध नहीं पी रहा हो।

  • पेशाब बहुत कम हो गया हो।

  • बार-बार उल्टी हो रही हो।

  • बहुत तेज सिरदर्द या गर्दन में अकड़न हो।

  • शरीर पर ऐसे दाने हों जो दबाने पर फीके न पड़ें।

  • बार-बार झटके आ रहे हों।

  • बच्चा लगातार बिगड़ता हुआ लग रहा हो।

बुखार के साथ कौन-कौन से Danger Signs देखना जरूरी है?

माता-पिता के लिए मैं इसे बहुत आसान तरीके से बताना चाहूँगा।

बुखार की संख्या से ज्यादा इन चीजों को देखिए।

बच्चा साँस कैसे ले रहा है?

अगर साँस बहुत तेज है, पसलियाँ अंदर धँस रही हैं या साँस लेने में बहुत मेहनत लग रही है, तो डॉक्टर को तुरंत दिखाएँ।

बच्चा पानी या दूध पी रहा है?

अगर बच्चा कुछ भी नहीं पी पा रहा है या बार-बार उल्टी कर रहा है, तो चिंता की बात है।

बच्चा पेशाब कर रहा है?

बहुत कम पेशाब होना शरीर में पानी की कमी का संकेत हो सकता है।

बच्चा सामान्य व्यवहार कर रहा है?

बहुत ज्यादा सुस्ती, बेहोशी या सामान्य प्रतिक्रिया न देना गंभीर संकेत हो सकता है।

शरीर पर कोई असामान्य दाने तो नहीं?

बुखार के साथ कुछ प्रकार के दाने गंभीर बीमारी का संकेत हो सकते हैं।

यानी बुखार के समय सिर्फ यह मत पूछिए—

"तापमान कितना है?"

यह भी पूछिए—

"बच्चा कैसा है?"

बुखार के साथ झटके क्यों आते हैं?

कुछ बच्चों में बुखार के दौरान Febrile Seizure या Febrile Convulsion नाम के झटके आ सकते हैं।

यह आमतौर पर छोटे बच्चों में देखा जाता है और इसका संबंध बच्चे के विकसित होते हुए मस्तिष्क और बुखार के दौरान उसकी संवेदनशीलता से होता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात—

हर बुखार में झटके नहीं आते और झटका आने का मतलब यह नहीं है कि बच्चे को मिर्गी हो गई है।

अधिकांश बच्चों में साधारण फ़ेब्राइल सीज़र के बाद बच्चा सामान्य रूप से विकसित होता है।

अगर बुखार में बच्चे को झटका आए तो क्या करें?

सबसे पहले घबराएँ नहीं।

बच्चे को सुरक्षित जगह पर करवट से लिटाएँ।

  • बच्चे को चोट से बचाएँ।

  • उसके मुँह में चम्मच, उँगली, कपड़ा या पानी बिल्कुल न डालें।

  • झटके को रोकने के लिए बच्चे को जबरदस्ती न पकड़ें।

  • झटका कितनी देर चला, इसका समय नोट करें।

अगर झटका 5 मिनट से ज्यादा चलता है, दोबारा आता है, बच्चा ठीक से साँस नहीं ले रहा है या झटका रुकने के बाद भी बच्चा सामान्य नहीं हो रहा है, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

फ़ेब्राइल सीज़र अपने आप में एक विस्तृत विषय है। इसलिए मैं इस पर एक अलग ब्लॉग लिखूँगा, जिसमें हम विस्तार से समझेंगे कि फ़ेब्राइल सीज़र क्यों होता है, किस बच्चे में दोबारा हो सकता है, क्या यह मिर्गी में बदलता है, दिमाग पर इसका कोई असर होता है या नहीं और झटका आने पर सही प्राथमिक उपचार क्या है।

क्या बुखार से बच्चे का दिमाग कमजोर हो जाता है?

सामान्य संक्रमण के कारण होने वाला बुखार आम तौर पर बच्चे के दिमाग को कमजोर नहीं करता।

इसी तरह साधारण फ़ेब्राइल सीज़र भी अधिकांश बच्चों में दिमाग को स्थायी नुकसान नहीं पहुँचाता।

लेकिन अगर बच्चा बहुत गंभीर रूप से बीमार है, लंबे समय तक झटका चल रहा है या शरीर का तापमान किसी अन्य कारण से खतरनाक रूप से बढ़ गया है, तो स्थिति अलग हो सकती है।

इसलिए गंभीर लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

आखिर बुखार में माता-पिता को क्या करना चाहिए?

जब बच्चे को बुखार हो तो सबसे पहले घबराने के बजाय इन चीजों को देखें—

1. तापमान सही तरीके से मापें।

2. बच्चे की उम्र देखें।

3. बच्चा कैसा व्यवहार कर रहा है, यह देखें।

4. वह पानी या दूध पी रहा है या नहीं, यह देखें।

5. साँस सामान्य है या नहीं, यह देखें।

6. पेशाब ठीक से हो रहा है या नहीं, यह देखें।

7. कोई उल्टी, दस्त, दाने, दौरे या अन्य लक्षण तो नहीं हैं, यह देखें।

8. बच्चे को परेशानी हो तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार पैरासिटामॉल दें।

9. बिना जरूरत एंटीबायोटिक शुरू न करें।

10. कोई Danger Sign दिखाई दे तो डॉक्टर से संपर्क करने में देर न करें।

अगर आपको बुखार से संबंधित किसी और जानकारी की आवश्यकता हो, तो आप मुझे मैसेज कर सकते हैं।

अगर आपको इस ब्लॉग में कोई तथ्य अधूरा या गलत लगता है, तो उसके बारे में भी मुझे जरूर बताइए। मैं उसे जाँचकर सुधारने की पूरी कोशिश करूँगा।

आपके सुझाव और प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं, और मैं कोशिश करूँगा कि उपयोगी सुझावों को इस ब्लॉग में शामिल किया जा सके।

नोट: इस ब्लॉग की जानकारी Indian Academy of Pediatrics (IAP), World Health Organization (WHO), American Academy of Pediatrics (AAP) तथा अन्य विश्वसनीय चिकित्सा दिशानिर्देशों और वैज्ञानिक साहित्य के आधार पर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य अभिभावकों को सामान्य जानकारी देना है। किसी विशेष बच्चे के लिए उपचार और दवा की सलाह उसके शिशु रोग विशेषज्ञ द्वारा बच्चे की स्थिति के अनुसार दी जानी चाहिए।

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